जन्मकुंडली के समस्त दोष एवं शास्त्रीय मुक्ति
वैदिक ज्योतिष में प्रत्येक ग्रह दोष के लिए महर्षि पाराशर एवं वराहमिहिर द्वारा अचूक परिहार बताए गए हैं। सही समय पर विधिपूर्वक किया गया अनुष्ठान व उपाय जीवन की दिशा बदल देता है।
अपनी जन्मकुंडली में दोष स्थिति का परीक्षण करें
लाहिड़ी अयनांश एवं पाराशर नियम अनुसार मांगलिक, कालसर्प व पितृ दोष का तुरंत परिणाम देखें।
समस्त १० प्रमुख कुण्डली दोष, प्रभाव एवं वैदिक परिहार
प्रत्येक दोष के पीछे छिपे ज्योतिषीय कारणों को समझें और प्रामाणिक उपायों से उनका समाधान प्राप्त करें।
१. मांगलिक दोष (भौम दोष)
कारण: मंगल ग्रह (1, 4, 7, 8, 12वें भाव में)विवाह में विलंब, वैवाहिक कलह, दुर्घटना का भय एवं जीवनसाथी के स्वास्थ्य पर विपरीत असर।
कुंभ विवाह, घट विवाह, मंगलवार हनुमान जी को सिंदूर अर्पण एवं विशेष भौम शांति अनुष्ठान।
२. कालसर्प दोष (१२ प्रकार)
कारण: राहु एवं केतु की धुरी में सभी ७ ग्रहकठिन परिश्रम के बाद भी असफलता, व्यापार में अचानक हानि, संतान संबंधी चिंता एवं मानसिक अशांति।
उज्जैन या त्र्यंबकेश्वर में कालसर्प शांति महापूजा, महामृत्युंजय जप एवं नाग-नागिन नदी प्रवाहित करना।
३. पितृ दोष (पूर्वज ऋण)
कारण: सूर्य-राहु युति, नवम भाव में पाप प्रभावपरिवार में निरंतर अशांति, वंश वृद्धि में रुकावट, गंभीर रोग व आकस्मिक आर्थिक संकट।
गया जी या हरिद्वार में त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, अमावस्या तर्पण एवं पीपल सेवा।
४. गुरु चाण्डाल दोष
कारण: बृहस्पति (गुरु) और राहु/केतु की युतिनिर्णय क्षमता में भ्रम, गलत संगति, उच्च शिक्षा में बाधा व समाज में अपयश की आशंका।
गुरुवार को भगवान विष्णु की पूजा, चने की दाल व पीले वस्त्र का दान, गुरु बीज मंत्र का नित्य जप।
५. शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या
कारण: शनि का चन्द्र राशि से १२, १, २ या ४, ८वें भाव में गोचरमानसिक तनाव, कार्यक्षेत्र में अत्यधिक संघर्ष, स्वास्थ्य विकार व परिजनों से अलगाव।
शनिवार को शनि शिला पर तैलाभिषेक, छाया दान, दशरथ कृत शनि स्तोत्र व शमी वृक्ष पूजन।
६. श्रापित दोष
कारण: शनि और राहु की एक ही भाव में युतिअकारण लांछन, पूर्व जन्म के पाप कर्मों का कष्ट एवं किसी भी कार्य का अंतिम समय में रुक जाना।
शनि-राहु शांति अनुष्ठान, शनिवार को चींटियों को आटा-शक्कर देना व भैरव आराधना।
७. केमद्रुम योग
कारण: चन्द्रमा के द्वितीय व द्वादश दोनों भावों का ग्रहविहीन होनामानसिक अकेलापन, धन संचय में अत्यंत कठिनाई एवं आत्मविश्वास की कमी।
सोमवार को शिवलिंग पर कच्चा दूध व मिश्री चढ़ाना, चांदी धारण करना व माता का आशीर्वाद।
८. अंगारक दोष
कारण: मंगल और राहु की किसी भी भाव में युतिअत्यधिक क्रोध, रक्त विकार, कोर्ट कचहरी, वाद-विवाद एवं दुर्घटना का योग।
मंगलवार को सुंदरकांड का पाठ, तांबे के पात्र में जल दान एवं शांत चित्त से साधना।
९. गंडमूल दोष
कारण: अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती में जन्मशिशु के स्वास्थ्य अथवा माता-पिता के स्वास्थ्य पर बाल्यकाल में प्रतिकूल प्रभाव।
जन्म के सत्ताईसवें (27वें) दिन 27 वृक्षों के पत्ते, 27 कुओं के जल से गंडमूल शांति हवन।
१०. ग्रहण दोष
कारण: सूर्य-केतु अथवा चन्द्र-राहु युतिनेत्र विकार, सरकारी कार्यों में बाधा, माता या पिता के स्वास्थ्य की चिंता व मानसिक अस्थिरता।
आदित्य हृदय स्तोत्र का नित्य पाठ, रविवार को गेहूं-गुड़ का दान व शिव आराधना।
किसी भी जटिल दोष निवारण अथवा गृह शांति हेतु
पंडित निपुण शर्मा • वैदिक विधि विधान एवं व्यक्तिगत परामर्श
